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Sunday, December 19, 2010

मेरी सहेली





है  कुछ  जानी-पहचानी सी  सहेली  यें, 
अपनी  सी  लगती  जब  अकेली  यें
इसके  दर्दों  की  दास्ताँ भी, 
कुछ अपने  सीने  मैं  हूकों  जैसी 
इसके  साहस की  कहानिया भी, 
कुछ  अपनी  करतूतों जैसी
है  मेरी  सहेली  ये  जो,
आइएने मैं  अपनी  सी  लगती  है 
है  कौन  ये जब  दहकती  है
तो  चिंगारी  सी  सुलगती  है.
है  कौन  यें?  तू, मैं,  या  वो. क्या  पता!
आग  तो  आग  है,  सब  एक-सी जलती हैं. 

Monday, April 13, 2009

कुछ अच्छा नही लगता


तुझ से दूर कुछ अच्छा नही लगता,
इस तन्हाई मैं अपना साया भी सच्चा नही लगता।
हर पल तू ख्यालों मैं है मौजूद,
इस खामोशी मैं प्रेम गीत भी अच्छा नही लगता।
तेरी यादों मैं डूबी हूँ इस कदर,
कोई दूसरा जगाये तो अच्छा नही लगता।
हर आहट मैं तुमको ही सोचा करती हूँ,
कोई शोर मचाये तो अच्छा नही लगता।
आसूं कुछ दोस्त से बन गए है अब,
कोई चुप कराये तो अच्छा नही लगता।
तू जो दूर इतना चला गया है,
कोई दूरी बताए तो अच्छा नही लगता।
इस चौराहे पर आज आ खड़ी हूँ मैं,
कोई रास्ता दिखाए तो अच्छा नही लगता।
तेरे इश्क ने बावरी तो कर दिया मुझे,
पर कोई पागल बताये तो अच्छा नही लगता।
कलम जो आज चली है, तुम्हारा ही अहसान है,
पर ये हुनर भी आज कुछ अच्छा नही लगता।
तेरे बदले ये कलम त्याग दू मैं,
क्योंकी इस कागज पर इतना दर्द अच्छा नही लगता।
तुझ से दूर कुछ अच्छा नही लगता.....

Sunday, September 7, 2008

और कुछ भी नही...

इक लम्हा बेफिकर सा,
इक हँसी बेपरवाह,
इक आंसू जो ढलका बेवजह,
और कुछ भी नही।

इक अधूरी सी बात,
इक नरम चांदनी रात,
इक खामोशी बिन घबराहट,
और कुछ भी नही।

इक कम चीनी की चाय,
इक कभी ना ख़तम होने वाली कीताब,
इक संतुष्टी का एहसास,
और कुछ भी नही।

इक पल भर तुम्हारे साथ,
इक भटकी हुई तलाश,
इक बहाना जो फिर हो मुलाक़ात,
और कुछ भी नही।

इक गालीब का गीत,
इक जाम और थोड़ा संगीत,
इक महफिल बिन आवाज,
और कुछ भी नही।

इक मेरी नई कवीता,
इक उसकी तारीफ़ का अंदाज,
इक नए हरफ की फिर तलाश,
और कुछ भी नही।

इक जीता हुआ मुकदमा,
इक इन्साफ की आवाज,
इक साहस फिर लड़ने को तैयार,
और कुछ भी नही।

इक दिन अपने आप के साथ,
इक कोरा पन्ना और,
इक कलम जो चले अपने आप!
और कुछ भी नही।

इक कंप्यूटर जो हिन्दी लिखे ठीक ठाक!
चाहिए इस जींदगी से और कुछ भी नही।

Wednesday, September 3, 2008




जीने दे के कुछ शब्द बाकी हैं अभी,
पीने दे के अभी तो कुछ कहा नही।

Monday, September 1, 2008



Fading behind the uncertain certainties,
Those sordid images haunted my creativity,
I must find some expression, I must borrow some shape,
Or I buy some words and wear a face,
Embrace the dark and whisper the unsaid,
You are a brilliant role-player and I guessed we relate!
What I could hardly understand, I wondered of late,
I express like an utter fool and wise men rate!

Thursday, August 28, 2008

लहरें




















अंधेरें कमरे मैं लौ के संग नाचती परछाईयां,
दिल के किसी कोने मैं लेती ख्वाईशैं अंगड़ाईयां ,
क्या थिरकते है पैर तुम्हारे भी इस लय के संग,
पर क्या फिर सिहर जाते हो तुम देख कर
काँटों के देश मैं ये मोम के हंस।

क्या अब ख़ुद पर भी व्यंग कसने लगे हो,
देखते हो रौशनी का झरोखां, या देख कर आँख बंद करने लगे हो?

धुंध मैं टिमटिमाता ये झिलिमल सितारा,
ये खोखला शहर, सूखे पेड़ और ये खामोश किनारा.
छुपी हैं अभी भी कुछ नटखट परछाईया इन खंडरों मैं कहीं,
देखो वो सफ़ेद मोती सपने लिए अभी भी चमकीलें कई।

बादल अभी भी गरजते हैं उसी अनहंकार से,
धरती अभी भी सीहरती है पहली बौछार से,
परिंदे आज भी उड़ान बेपरवाह भरते हैं,
फूल आज भी भँवरे की गुंजार से मचलते हैं।

बोल आज तू भी के जिंदा है अभी,
खिलखिला के हंस के मुसकुरायेंगे तेरे संग और कई।
नाच आज तू भी इस पुरवाई के संग,
झूमेंगे कुछ और भी देख तेरी ये उमंग।

डुबो दे आज ये ऊँचे महल अपनी मन सागर की लहरों तले,
भीगो दे ये सुखा शहर लगा आज अपने आप को गले।

बोल आज के तू  भी के जिंदा है अभी.....

Wednesday, August 27, 2008


श्रींगार समझते आए हैं जिनको सदियों से,
उन बेड़ीयों की हमें आदत सी हो गई है.